​ ​ बैंकों के विवेकपूर्ण, प्रबंधन मानदंडों को सख्त बनाएं : बिमल जालान
Monday, December 10, 2018 | 1:10:30 PM

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बैंकों के विवेकपूर्ण, प्रबंधन मानदंडों को सख्त बनाएं : बिमल जालान

Friday, October 12, 2018 19:26:30 PM , Viewed: 52
  • नई दिल्ली, 12 अक्टूबर | भविष्य में वित्तीय संकट की संभावनाओं को कम करने की दिशा में भारत को अंतर्राष्ट्रीय उच्च मानकों के अनुरूप विवेकपूर्ण प्रबंधन व पूंजीनिर्माण मानकों को सुदृढ़ बनाने की प्रक्रिया जारी रखनी चाहिए।

    यह बात भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर बिमल जालान ने अपनी नई किताब में कही है। उनकी यह किताब 'इंडिया अहेड 2025 एंड बियांड' में कही है।

    उन्होंने कहा, "अधिकतम पादर्शिता, खुलासा और जिम्मेदारी लाने की कोशिश जारी रखना भी अहम है ताकि वित्तीय लेन-देन के लिए निवेशक और प्रतिपक्षी बाजार और अन्य जोखिमों की पूरी जानकारी और अपने आकलन के आधार पर निर्णय ले सकें।"

    पूर्व वित्त सचिव और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बिमल जालान कहते हैं कि सख्त प्रबंधन मानकों से निस्संदेह कुछ कष्ट होगा और बैंकों व वित्तीय संस्थानों पर अधिक जिम्मेदारी थोपी जाएगी।

    हालांकि अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों, स्वरूपों और संबंधों के शामिल होने से वित्तीय क्षेत्र का विनिमयन अब सिर्फ पसंद या घरेलू चिंता का मसला नहीं रह गया है। कालक्रम में कदाचित वित्तीय कारोबार करना शेष दुनिया की सम्मति पर निर्भर हो गया है। चाहे व्यापार साख की बात हो या प्रत्यक्ष निवेश या अन्य प्रकार का निवेश व कर्ज भारत के वित्तीय व्यापार में उनके भरोसे पर निर्भर करेगा।

    वह कहते हैं कि इसलिए भारत को अपने विवेकपूर्ण प्रबंधन में वक्र रेखा से आगे रहना चाहिए।

    गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) की समस्या के संबंध में जालान कहते हैं कि सभी बैंकों को अपने आंतरिक नियंत्रण और जोखिम प्रबंधन तंत्र को मजबूत करने के लिए और समय से पड़ताल करने और कार्रवाई करने के लिए पूर्व चेतावनी संकेत बनाने के लिए जोरदार कड़ी मशक्कत करनी होगी।

    इसके बाद, एनपीए समस्या के समाधान के लिए कॉरपोरेट की बड़ी जिम्मेदारी की जरूरत है ताकि चूक के मामले में समय पर खुलासा हो और सक्षम साख सूचना तंत्र हो। भविष्य में सख्त लेखा और विवेकपूर्ण मानकों की मदद से एनपीए की समस्या से निपटा जा सकता है।

    भारत के केंद्रीय बैंक में शीर्ष पद पर रहे जालान कहते हैं कि भविष्य में कभी न कभी संवेदनशील और विवादास्पद सवाल से जूझना पड़ेगा। चाहे वह हमारे बैंकों के सार्वजनिक क्षेत्र के स्वरूप का हो या अन्य संस्थानों का जोकि भारत के बैंकिंग क्षेत्र पर दबदबा रखता है और वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी भूमिका अदा करने में सक्षम है।

    निष्पक्ष रूप से इस मसले पर विचार करने के क्रम में वित्तीय तंत्र के इस विशेष अभिलक्षण के साथ जुड़े लाभ और हानि को भी स्वीकार करना होगा।

    वर्ष 2003 से लेकर 2009 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे जलान कहते हैं कि भूराजनीतिक खतरों, जनसांख्यिकी, प्रौद्योगिकी और जलवायु परिवर्तन के बड़े जोखिम हो सकते हैं। इन जोखिमों को दूर करने के लिए देशों को बाजार को अधिक महत्व देना चाहिए और कर्ज पर मौजूदा निर्भरता को पुनर्संतुलित करना चाहिए।

     

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